गांधी की यादें इस देश के लोगों के ज़हनों से जा चुकी हैं- आंबेडकर
26 फरवरी 1955 में बीबीसी से एक इंटरव्यू में बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने महात्मा गांधी के बारे में उनकी राय पर साफ शब्दों में कहा था कि "मुझे इस बात पर काफी हैरानी होती है कि पश्चिम गांधी में इतनी दिलचस्पी क्यों लेता है? जहां तक भारत की बात है तो वो देश के इतिहास का एक हिस्सा-भर हैं, कोई युग निर्माण करने वाले नेता नहीं। गांधी की यादें इस देश के लोगों के ज़हनों से जा चुकी हैं।"
कृपया, इस वाक्य को फिर से दोहराइए कि "गांधी की यादें इस देश के लोगों के ज़हनों से जा चुकी हैं।"
गांधी जी के बारे बारे में आंबेडकर की राय आज की वास्तविकता है। हिन्दू नेशनलिस्ट पॉलिटिक्स में ख़ासा दिलचस्पी रखने वाले पत्रकार व बहुचर्चित किताब "द आरएसएस- आइकॉन्स ऑफ द इंडियन राइट" लिखने वाले लेखक नीलांजन मुखोपाध्याय कहते हैं कि "26 मई 2014 को नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री की शपथ लेते हैं। उससे ठीक एक दिन बाद जो कि वीर सावरकर की बर्थ एनिवर्सरी भी है, उस समय पीएम मोदी पार्लियामेंट जाते हैं और जाके वीर सावरकर की पोट्रेट को माला पहनाते हैं। प्रधानमंत्री बनने के दूसरे दिन ही वीर सावरकर का इस तरह से सम्मान किया जाना, हमको ये मानना पड़ेगा कि वीर सावरकर बहुत ही विवादास्पद कैरेक्टर थे। हम नहीं भूल सकते कि गांधी जी की हत्या के मामले में वीर सावरकर के खिलाफ केस चला था। वो बरी हो गए थे लेकिन वीर सावरकर के जीवनकाल में ही दोबारा से कपूर कमीशन बैठी थी और कपूर कमीशन की रिपोर्ट में जो कहा जाता है, वो ये कि विनायक दामोदर सावरकर से गांधी जी की हत्या के मामले में "शक की सुई" हटी नहीं है। पार्लिमेंट जाके उस नेता को अपना मानना एक बहुत बड़ा प्रतीकात्मक कार्य था प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का।"
तो क्या मान लिया जाए कि गांधी की यादें इस देश के लोगों के ज़हनों से जा चुकी हैं?
02 फरवरी 2019 को मैंने लिखा था कि तो गांधी जी आज भी मारे जा रहे हैं। लेकिन गांधी जी को आज भी क्यूं मारा जा रहा है? ये सवाल ख़ुद से पूछिए। गांधी जी को तो नाथूराम विनायक गोडसे ने 30 जनवरी 1948 को ही प्रार्थना सभा में गोली मारकर ख़त्म कर दिया था फिर पूजा सकुन पांडेय को ऐसा क्यूं लग रहा है कि गांधी जी नहीं मरे? बीती 30 जनवरी 2019 के दिन सोशल मीडिया पर उनका एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें वह "महात्मा नाथूराम अमर रहें" का नारा लगाते हुए नकली तमंचे से गांधी जी की तस्वीर पर निशाना साधते हुए ठीक तस्वीर की कोख पर गोली मारती हैं। तस्वीर के पीछे ठीक उसी जगह पर लटका हुआ लाल कलर से भरा पानी का गुब्बारा फूटता है और नकली खून बहना शुरू हो जाता है। थोड़ी देर के बाद एक और व्यक्ति गांधी जी की तस्वीर पर पेट्रोल छिड़क कर आग लगा देता है। पेट्रोल छिड़कने के बाद वह शख़्स इतनी क़रीब से आग लगाता है कि जिससे आग की लपट से वो भी छटपटा जाता है। ज़रा सोचिए और सोचने वाली बात भी है। ऐसे लोग महात्मा गांधी जी को नस्तोनाबूद करना चाहते हैं, जिन्हें ये तक तमीज़ नहीं कि पेट्रोल डालकर कभी क़रीब जाकर आग नहीं लगाते। मेरे हिसाब से तो पूजा सकुन पांडेय को ऐसा कतई नहीं करना चाहिए था बल्कि उन्हें तो गांधी जी से जुड़ी हुई तमाम किताबों को जलाना चाहिए था। ऐसे तो गांधी जी आज़ादी के बाद लगातार वर्ष दर वर्ष मारे जा रहे हैं। गांधी जी कोई शख़्स ही नहीं हैं जो इतनी आसानी से मर जाएं। गांधी जी एक सोच हैं। गांधी जी अहिंसा के ऐसे पुजारी हैं, जिन्होंने सम्पूर्ण स्वराज्य में कहीं भी हिंसा का प्रयोग नहीं किया है।
नोट: गांधी जी की यादें इस देश के लोगों के ज़हनों से कभी नहीं जाने वाली। ऐसा ज़रूरी नहीं है कि हर एक बुद्धिमान व्यक्ति ने जो भविष्य वाणी की हो या किसी के बारे में विचार रखे हों तो वो मूलतः सत्य ही हों, ऐसा हरगिज़ नहीं है। गांधी जी के बारे में आंबेडकर की ये राय कि "गांधी की यादें इस देश के लोगों के ज़हनों से जा चुकी हैं।" बिल्कुल गलत है। दो-चार व्यक्ति राष्ट्र की अवधारणा को साकार नहीं कर सकते और खासतौर से लोकतांत्रिक राष्ट्र की व्यवस्था को तो कतई नहीं। भारत विविधताओं से परिपूर्ण राष्ट्र है। यहां मातृ भाषा का भी उतना ही महत्व है जितना कि क्षेत्रीय भाषा का। गांधी अमर हैं, गांधी अजर हैं। गांधी अहिंसा के प्रतीक हैं, गांधी विश्व शांति के दूत हैं।
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