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वो कहने की कोशिश है जो आपकी सिसकियों में है। ज़्यादा बुद्धिमान हूँ नहीं, बस वो लिखता हूँ जो राह-गली चलते-फिरते देखता हूँ। दिल्ली विश्वविद्यालय से पता चला है कि अपने नाम में पत्रकार शब्द जोड़ सकता हूँ। सीखने का सिलसिला बदस्तूर जारी है। परिवार बगैर पढ़ा-लिखा है, उनके बीच मैं ऐसा हूँ जैसे किसी बत्तख के नीचे रखे गए बत्तख के अंडों में किसी ने एक अंडा जावा मुर्गी का रख दिया हो, अब जब बच्चे निकल ही आए हैं तो मैं दूर से पहचान लिया जाता हूँ। लिखने की कवायद हर पल जारी रहती है, कभी मन में, कभी नोट में।
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हम अपने बच्चों को कहाँ लेकर जा रहे हैं ?
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